इधर हम प्यासे मर रहे और उधर गुजरात जा रहा हमारा पानी

गुरुवार को सेन्ट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ माइनिंग एण्ड रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिकों ने निर्माण के बाद बहली बार सुरंग में जाकर तकनीकी जांच कर डीपीआर बनाना शुरू कर दिया। जल संसाधन विभाग की माने तो दो माह में डीपीआर बनाने का काम पूरा हो जाएगा। जल संसाधन विभाग ने सेई के दर्द को समझकर कम समय में बांध का अधिकाधिक पानी में जवाई में लाने के लिए महती योजना पर कार्य शुरू किया है।

 

राज्य सरकार से डीपीआर की स्वीकृति मिलने के बाद विभागीय अधिकारियों ने सेन्ट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ माइनिंग एण्ड रिसर्च सेंटर नागपुर के डॉ. मणिराम सहारण के नेतृत्व में आई टीम को हालात बताए। टीम ने देखा कि सुरंग में कहीं दो तो कहीं तीन फीट तक पानी भरा था। वैज्ञानिकों ने करीब एक किलोमीटर तक सुरंग में जाकर अत्याधुनिक मशीनों से पत्थरों व आस-पास की स्थिति की जांच की। आगामी दिनों में सेई की पूरी सुरंग की जांच लेंगे। डीपीआर पर 5 लाख रुपए की लागत आने का अनुमान है। सुरंग निरीक्षण के दौरान अधिशासी अभियंता प्रतापसिंह चावड़ा भी मौजूद थे।

 

उदयपुर की सीमा में बांध बनाकर सुरंग भी बनाई

जवाई बांध में जल आवक बढ़ाने के उद्ेश्य से जल संसाधन विभाग ने 70 के दशक में उदयपुर जिले की कोटड़ा तहसील में अरावली पर्वत मालाओं के बीच सेई बांध बनाकर सुरंग से पानी लाने की योजना बनाई थी। योजना के तहत 8.25 मीटर ऊंचे व 1106.58 एमसीएफटी भराव क्षमता वाले बांध का निर्माण किया गया। पहाड़ काटकर 6.77 किलोमीटर लम्बी सुरंग बनाई। इनलेट के माध्यम से सुरंग को बांध से जोड़ा गया। भीमाना के समीप सुरंग के निकासी स्थल पर आउटलेट का निर्माण किया। इस योजना पर 5 करोड़ 40 लाख रुपए लागत आई। वर्ष1977 को योजना का कार्य पूर्ण हो गया और 7 अगस्त 1977 को पहली बार सेई का पानी सुरंग के माध्यम से जवाई बांध में आने लगा।

 

सेई निर्माण के समय पहाड़ी में जल निकासी के लिए 8.50 फीट ऊंची व 12 फीट चौड़ी सुरंग बनाकर उस पर गेट लगाए गए। इस सुरंग से 328 क्यूसेक पानी की निकासी होती है और जवाई बांध में औसतन 22 एमसीएफटी पानी प्रतिदिन आता है। ऐसे में सेई का समूचा पानी जवाई बांध में अपवर्तित होने में ढाई से तीन महिने लग जाते हैं। इस दौरान अधिक बारिश होने पर सेई छलकने लगता है और खाली होने तक बारिश का सीजन समाप्त हो जाता है।

 

इन 3 साल में खूब हुआ ओवरफ्लो

वर्ष 2006, 2008 व 2015 में सेई बांध भराव क्षमता को पार कर गया और ओवरफ्लो से लाखों क्यूसेक पानी गुजरात की ओर बहकर चला गया। गत वर्ष भी सेई के ओवरफ्लो होने से करीब तीन हजार एमसीएफटी पानी व्यर्थ बहकर गुजरात चला गया।

 

2006 में भराव क्षमता भी बढ़ा दी

शुरुआत में सेई से जवाई में औसतन 3 हजार एमसीएफटी पानी आने लगा, लेकिन ओवरफ्लो से पानी गुजरात भी जाता रहा। वर्ष 2006 में सेई बांध का विस्तार कर गेज 8.25 से 10.93 मीटर व भराव क्षमता 1106.58 से बढ़कर 1618.50 एमसीएफटी की गई। बांध में करीब पांच सौ एमसीएफटी अतिरिक्त पानी जमा होने लगा।

 

नई योजना पर 150 करोड़ खर्च होने का अनुमान

सेई सुरंग का विस्तार कर 8.50 गुणा 12 फीट से बढ़ाकर 18 गुणा 18 फीट करने का प्रस्ताव है। सुरंग को बड़ा करने पर इसमें 328 की जगह 1376 क्यूसेक पानी की निकासी होगी। सेई से जवाई में प्रतिदिन 118 एमसीएफटी पानी आ सकेगा। सेई के लाइव स्टोरेज का पूरा पानी 12 दिन में जवाई बांध पहुंच सकेगा। बांध के जल्दी खाली होने पर ओवरफ्लो से होने वाली जल बर्बादी रुक जाएगी और जवाई में सेई से अधिकाधिक पानी लाया जा सकेगा। इस योजना पर करीब 150 करोड़ की लागत का अनुमान है।

 

गत वर्ष ही दे दिए गए थे डीपीआर के निर्देश

गत वर्ष जलसंसाधन विभाग के मुख्य अभियंता सुमनेशलाल माथुर व उपमुख्य सचेतक मदन राठौड़ ने सेई बांध का निरीक्षण किया तब बांध लबालब भरा था और ओवरफ्लो चल रहा था। स्थानीय अधिकारियों ने बताया था कि सुरंग की क्षमता कम होने से निकासी बहुत कम मात्रा में होती है और ओवरफ्लो का पानी व्यर्थ बहकर गुजरात चला जाता है। राठौड़ व मुख्य अभियंता ने तब अधिकारियों को सेई सुरंग की क्षमता बढ़ाने के लिए प्रारूप बनाकर अनुमानित लागत का निर्धारण करने के निर्देश दिए थे।

 

सेई सुरंग की क्षमता बढ़ाने के लिए योजना की डीपीआर बनाने का कार्य प्रारंभ किया है। सीआइएमआर नागपुर से आए वैज्ञानिक सुरंग की जांच कर रहे हैं। दो माह में योजना की डीपीआर बनाकर विभाग को सुपुर्द करेंगे।

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